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12 Dec 2017

पैसा जरुरी है या ज्ञान कौन ज्यादा जरुरी है

आज पढ़िए 3 ज्ञान की बाते (hindi me kahani)  रामदीन नामके एक व्यक्ति की पारिवारिक हिंदी कहानी है जो हमें Gyan की सीख भी देती है-

Teen Gyan ki Baatein – Hindi me Kahani

पुराने ज़माने की बात है रामदीन नाम का एक युवक किसी जमीदार के यहाँ नौकरी करता था.
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कई सालों तक नौकरी करते-काते रामदीन को अपने परिवार की याद सताने लगी.एक दिन उसने जमीदारसे अपने मन की चिंता कही. जमींदार ने कहा, ‘जरूर जाओ बेटा, लेकिन जाने से पहले तुम्हारी तनख्वाह के अलावा मैं तुम्हें उपहारस्वरूप कुछ देना चाहता हूँ. उपहार के रुप में तुम्हारे पास  दो विकल्प हैं.

पैसा जरुरी है या ज्ञान कौन ज्यादा जरुरी है 

पहला, सोने को तीन मोहरे और दूसरा विकल्प है, तीन ज्ञान की बातें. रामदीन अपने मालिक को चतुराई से काफी प्रभावित था. उसने कहा, मालिक  पैसे तो मेरे पास हैं. मैंने  तनख्वाह के पैसों में भी काफी बचत की  है. मुझे आप ज्ञान की तीन बाते  बता दें.
जमींदार ने कहा, “तो ध्यान से सुनो. पहली ज्ञान की बात है. कभी भी पुराने के बदले नया रास्ता चुनोइ की गे, तो तुम्हें नई मुसीबतों का सामना करता पडेगा. दूसरी बात हैं, देखो ज्यादा, और बोलो बिल्कुल कम…. और ज्ञान की तीसरी बात  है, कोई भी चीज करने से पहले अच्छी तरह सोच लो.’
ऐसा कहकर जमीदार ने उसे एक मोटी-भी रोटी दी और कहाकि जब भी वह सचमुच  खुशी महसूस को तब तुम रोटी को तोड़ लेना  है.
रामदीन जमीदार से विदा लेकर चल दिया. रास्ते में उसे दुसरे राहगीर मिले. उन्होंने रामदीन से कहा  ‘हम तो छोटे रास्ते से आगे बढेंगे, समय कम लगेगा’. तभी रामदीन को जमीदार की कही बात याद आ गयी, उसने कहा नहीं दोस्तों मै तो इसी रास्ते से आगे जाऊंगा.यह कहकर रामदीन आगे बढ़ गया.
आधे रास्ते आगे चलने पर उसने कुछ धमाके सुने. वह समझ गया कि उसके साथ चल रहे दूसरे लोग, जो छोटे कुछ ज्ञान की बातेंरास्ते से गये हैं, डकैतों के शिकार वन गए है.


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और कुछ समय आगे जाने पर रामदीन को भूख लग आई थी. वह एक सराय में भोजन और आराम करने पहुंचा. उसे खाना परोसा गया. रामदीन को खाना कुछ अजीब लगा. उसने देखा, उसे जो माँस परोसा गया था, वह इंसान का था. उसने सराय के मालिक को डांटने फटकारने की बात सोची. लेकिन तभी जमींदार की  कही दूसरी बात याद आ गयी. उसने चुपचाप खाने के पैसे चुकाए और आगे चढ़ने लगा
तभी सराय के मालिक ने कहा, “सुनो! आज तुमने अपनी जान बचा ली. जिसने भी आजतक भोजन में  मीनमेख निकाला, उन्हें मैंने खूब पीटा और मार डाला, फिर उनका माँस पका कर बेच दिया.’  रामदीन ने उसकी बात सुन ली, लेकिन कुछ कहा नहीं.
शाम तक रामदीन अपने घर पहुंच गया. उसने देखा कि घर में उसकी पत्नी एक युवक के साथ हंस-हंस कर बाते कर रही हैं. उसे बहुत गुस्सा आया. वह वहाँ पड़ी एक लाठी से उस युवक का सिर फोड़ने ही वाला था. तब तक उसे जमींदार को तीसरी बात याद आ गई.
वह पत्नी के नजदीक पहुंचा, तो पत्नी खुशी से उछल पड़ी. उसने युवक से कहा, ‘अरे दीपक! ये तुम्हारे पिताजी हैं.’ फिर उसने रामदीन से कहा, ‘यहआपका बेटा है है देखो केसेसंयोग हैं. यह भी कई ‘सालों तक पढाई करके आज ही घर लौटा है, और आप भी.’
रामदीन को खुशी का ठीकाना न रहा. अगर उसने जमींदार से ज्ञान की तीन बातें न सीखी होती तो या तो वह घर पहुँच ही नहीं पाता, किसी तरह पहुंच पता तो अब बेटे की  हत्या कर बैठता
तभी उसे जमींदार द्वारा दी गई रोटी को याद आई, उसने कहा था कि सचमुच खुश होने पर रोटी को तोड़ना. रोटी तोड़ते भी उसमें से तीन सोने को मोहरें निकलीं, जिसे उसके दयालु मालिक ने छिपा कर रखा था.

27 Sep 2017

Mathama ka आखिरी उपदेश aapki jindagi badal dega jarur padhe

गुरुकुल में शिक्षा प्राप्त कर रहे शिष्यों  में आज काफी उत्साह था , उनकी बारह वर्षों की शिक्षा आज पूर्ण हो रही
आखिरी उपदेश …
थी और अब वो अपने घरों को लौट सकते थे . गुरु जी भी अपने शिष्यों की शिक्षा-दीक्षा से प्रसन्न थे और गुरुकुल की परंपरा के अनुसार शिष्यों को आखिरी उपदेश देने की तैयारी कर रहे थे।
उन्होंने ऊँची आवाज़ में कहा , ” आप सभी एक जगह एकत्रित हो जाएं , मुझे आपको आखिरी उपदेश देना है 
.”
गुरु की आज्ञा का पालन करते हुए सभी शिष्य एक जगह एकत्रित हो गए .
गुरु जी ने अपने हाथ में कुछ लकड़ी के खिलौने पकडे हुए थे , उन्होंने शिष्यों को खिलौने दिखाते हुए कहा , ” आप को इन तीनो खिलौनों में अंतर ढूँढने हैं।”
सभी शिष्य ध्यानपूर्वक खिलौनों को देखने लगे , तीनो लकड़ी से बने बिलकुल एक समान दिखने वाले गुड्डे थे . सभी चकित थे की भला इनमे क्या अंतर हो सकता है ?
तभी किसी ने कहा , ” अरे , ये देखो इस गुड्डे के में एक छेद  है .”
यह संकेत काफी था ,जल्द ही शिष्यों ने पता लगा लिया और गुरु जी से बोले ,
” गुरु जी इन गुड्डों में बस इतना ही अंतर है कि –
एक के दोनों कान में छेद है
दूसरे के एक कान और एक मुंह में छेद है ,
और तीसरे के सिर्फ एक कान में छेद है  “
गुरु जी बोले , ” बिलकुल सही , और उन्होंने धातु का एक पतला तार देते हुए उसे कान के छेद में डालने के लिए कहा .”
 शिष्यों  ने वैसा ही किया . तार पहले गुड्डे के एक कान से होता हुआ दूसरे कान से निकल गया , दूसरे गुड्डे के कान से होते हुए मुंह से निकल गया और तीसरे के कान में घुसा पर कहीं से निकल नहीं पाया .
तब  गुरु जी ने शिष्यों से गुड्डे अपने हाथ में लेते हुए कहा , ” प्रिय शिष्यों , इन तीन गुड्डों की तरह ही आपके जीवन में तीन तरह के व्यक्ति आयेंगे .
पहला गुड्डा ऐसे व्यक्तियों को दर्शाता है जो आपकी बात एक कान से सुनकर दूसरे से निकाल देंगे ,आप ऐसे लोगों से कभी अपनी समस्या साझा ना करें .
दूसरा गुड्डा ऐसे लोगों को दर्शाता है जो आपकी बात सुनते हैं और उसे दूसरों के सामने जा कर बोलते हैं , इनसे बचें , और कभी अपनी महत्त्वपूर्ण बातें इन्हें ना बताएँ।
और  तीसरा गुड्डा ऐसे लोगों का प्रतीक है जिनपर आप भरोसा कर सकते हैं , और उनसे किसी भी तरह का विचार – विमर्श कर सकते हैं , सलाह ले सकते हैं , यही वो लोग हैं जो आपकी ताकत है और इन्हें आपको कभी नहीं खोना चाहिए . “

dosto kaise lagi ye story - Mathama ka आखिरी उपदेश aapki jindagi badal dega jarur padhe  .. niche comment ke madhyam se bataye ..

26 Sep 2017

Agar aapko dusre ki bate buri lagti hai to es kahani ko jarur padhe

एक बार गौतम बुद्ध किसी गाँव से गुजर रहे थे| उस गाँव के लोगों को गौतम बुद्ध के बारे में गलत धारणा थी जिस कारण वे बुद्ध को अपना दुश्मन मानते थे| जब गौतम बुद्ध गाँव में आये तो गाँव वालों ने बुद्ध को भला बुरा कहा और बदुआएं देने लगे|
गौतम बुद्ध गाँव वालों की बातें शांति से सुनते रहे और जब गाँव वाले बोलते बोलते थक गए तो बुद्ध ने कहा – “अगर आप सभी की बातें समाप्त हो गयी हो तो मैं प्रस्थान करूँ”
बुद्ध की बात सुनकर गाँव वालों को आश्चर्य हुआ| उनमें से एक व्यक्ति ने कहा – “हमने तुम्हारी तारीफ नहीं की है| हम तुम्हे बदुआएं दे रहे है| क्या तुम्हे कोई फर्क नहीं पड़ता????”


बुद्ध ने कहा – जाओ मैं आपकी गालियाँ नहीं लेता| आपके द्वारा गालियाँ देने से क्या होता है, जब तक मैं गालियाँ स्वीकार नहीं करता इसका कोई परिणाम नहीं होगा| कुछ दिन पहले एक व्यक्ति ने मुझे कुछ उपहार दिया था लेकिन मैंने उस उपहार को लेने से मना कर दिया तो वह व्यक्ति उपहार को वापस ले गया| जब मैं लूंगा ही नहीं तो कोई मुझे कैसे दे पाएगा|
बुद्ध ने बड़ी विनम्रता से पूछा – अगर मैंने उपहार नहीं लिया तो उपहार देने वाले व्यक्ति ने क्या किया होगा| 
भीड़ में से किसी ने कहा – उस उपहार को व्यक्ति ने अपने पास रख दिया होगा|
बुद्ध ने कहा – मुझे आप सब पर बड़ी दया आती है क्योंकि मैं आपकी इन गालियों को लेने में असमर्थ हूँ और इसलिए आपकी यह गालियाँ आपके पास ही रह गयी है|  

दोस्तों भगवान गौतम बुद्ध के जीवन की यह छोटी सी कहानी हमारे जीवन में एक बड़ा बदलाव ला सकती है क्योंकि हम में से ज्यादात्तर लोग यही समझते है कि हमारे दुखों का कारण दूसरे व्यक्ति है| हमारी परेशानियों या दुखों की वजह कोई अन्य व्यक्ति नहीं हो सकता और अगर हम ऐसा मानते है कि हमारी परेशानियों की वजह कोई अन्य व्यक्ति है तो हम अपनी स्वंय पर नियंत्रण की कमी एंव भावनात्मक अक्षमता को अनदेखा करते है|
यह हम पर निर्भर करता है कि हम दूसरों के द्वारा प्रदान की गयी नकारात्मकता को स्वीकार करते है या नहीं| अगर हम नकारात्मकता को स्वीकार करते है तो हम स्वंय के पैर पर कुल्हाड़ी मारते है|

Hii Apko ye story - Agar aapko dusre ki bate buri lagti hai to es khanai ko jarur padhe niche comment ke jariye apni ray de skte hai ..

31 Jul 2017

🌹बहूत सुंदर कथा भगवान अपनी भक्त को कभी अकेला नही छोड़ते।  🌹





(भक्त और भगवान की कहानी)


मेरा वृन्दावन

 एक राजा ने भगवान कृष्ण का एक मंदिर बनवाया
और पूजा के लिए एक पुजारी को लगा दिया. पुजारी बड़े भाव से
बिहारीजी की सेवा करने लगे. भगवान की पूजा-अर्चना और
सेवा-टहल करते पुजारी की उम्र बीत गई. राजा रोज एक फूलों की

(भक्ति कहानी)

माला सेवक के हाथ से भेजा करता था.पुजारी वह माला बिहारीजी
को पहना देते थे. जब राजा दर्शन करने आता तो पुजारी वह माला बिहारीजी के गले से उतारकर राजा को पहना देते थे. यह रोज का
नियम था. एक दिन राजा किसी वजह से मंदिर नहीं जा सका.
उसने एक सेवक से कहा- माला लेकर मंदिर जाओ. पुजारी से कहना
आज मैं नहीं आ पाउंगा. सेवक ने जाकर माला पुजारी को दे दी और
बता दिया कि आज महाराज का इंतजार न करें. सेवक वापस आ
गया.

(भक्त भगवान)

 पुजारी ने माला बिहारीजी को पहना दी. फिर उन्हें विचार आया कि आज तक मैं अपने बिहारीजी की चढ़ी माला
राजा को ही पहनाता रहा. कभी ये सौभाग्य मुझे नहीं
मिला.जीवन का कोई भरोसा नहीं कब रूठ जाए. आज मेरे प्रभु ने
मुझ पर बड़ी कृपा की है. राजा आज आएंगे नहीं, तो क्यों न माला
मैं पहन लूं. यह सोचकर पुजारी ने बिहारीजी के गले से माला
उतारकर स्वयं पहन ली. इतने में सेवक आया और उसने बताया कि राजा की सवारी बस मंदिर में पहुंचने ही वाली है.यह सुनकर
पुजारी कांप गए. उन्होंने सोचा अगर राजा ने माला मेरे गले में देख
ली तो मुझ पर क्रोधित होंगे. इस भय से उन्होंने अपने गले से
माला उतारकर बिहारीजी को फिर से पहना दी. जैसे ही राजा
दर्शन को आया तो पुजारी ने नियम अुसार फिर से वह माला
उतार कर राजा के गले में पहना दी. माला पहना रहे थे तभी राजा को माला में एक सफ़ेद बाल दिखा.राजा को सारा माजरा समझ गया
कि पुजारी ने माला स्वयं पहन ली थी और फिर निकालकर
वापस डाल दी होगी. पुजारी ऐसाछल करता है, यह सोचकर राजा
को बहुत गुस्सा आया. उसने पुजारी जी से पूछा- पुजारीजी यह
सफ़ेद बाल किसका है.? पुजारी को लगा कि अगर सच बोलता हूं
तो राजा दंड दे देंगे इसलिए जान छुड़ाने के लिए पुजारी ने कहा- महाराज यहसफ़ेद बाल तो बिहारीजी का है. अब तो राजा गुस्से
से आग- बबूला हो गया कि ये पुजारी झूठ पर झूठ बोले जा रहा
है.भला बिहारीजी के बाल भी कहीं सफ़ेद होते हैं. राजा ने कहा-
पुजारी अगर यह सफेद बाल बिहारीजी का है तो सुबह शृंगार के
समय मैं आउंगा और देखूंगा कि बिहारीजी के बाल सफ़ेद है या
काले. अगर बिहारीजी के बाल काले निकले तो आपको फांसी हो जाएगी. राजा हुक्म सुनाकर चला गया.अब पुजारी रोकर
बिहारीजी से विनती करने लगे- प्रभु मैं जानता हूं आपके
सम्मुख मैंने झूठ बोलने का अपराध किया.

(विष्णु भगवान की कथा)

 अपने गले में डाली
माला पुनः आपको पहना दी. आपकी सेवा करते-करते वृद्ध हो
गया. यह लालसा ही रही कि कभी आपको चढ़ी माला पहनने का
सौभाग्य मिले. इसी लोभ में यह सब अपराध हुआ. मेरे ठाकुरजी पहली बार यह लोभ हुआ और ऐसी विपत्ति आ पड़ी है. मेरे
नाथ अब नहींहोगा ऐसा अपराध. अब आप ही बचाइए नहीं तो
कल सुबह मुझे फाँसी पर चढा दिया जाएगा. पुजारी सारी रात रोते
रहे. सुबह होते ही राजा मंदिर में आ गया. उसने कहा कि आज
प्रभु का शृंगार वह स्वयं करेगा. इतना कहकर राजा ने जैसे ही मुकुट
हटाया तो हैरान रह गया. बिहारीजी के सारे बाल सफ़ेद थे. राजा को लगा, पुजारी ने जान बचाने के लिए बिहारीजी के बाल रंग
दिए होंगे. गुस्से से तमतमाते हुए उसने बाल की जांच करनी
चाही. बाल असली हैं या नकली यब समझने के लिए उसने जैसे
ही बिहारी जी के बाल तोडे, बिहारीजी के सिर से खून
कीधार बहने लगी. राजा ने प्रभु के चरण पकड़ लिए और क्षमा
मांगने लगा. बिहारीजी की मूर्ति से आवाज आई- राजा तुमने आज तक मुझे केवल मूर्ति ही समझा इसलिए आज से मैं तुम्हारे
लिए मूर्ति ही हूँ. पुजारीजी मुझे साक्षात भगवान् समझते हैं.
उनकी श्रद्धा की लाज रखने के लिए आज मुझे अपने बाल सफेद
करने पड़े व रक्त की धार भी बहानी पड़ी तुझे समझाने के लिए.
यह कहानी किसी पुराण से तो नहीं है लेकिन इसका मर्म
किसी पुराण की कथा से कम भी नहीं है. कहते हैं- समझो तो देव नहीं तो पत्थर.श्रद्धा हो तो उन्हीं पत्थरों में भगवान सप्राण
होकर भक्त से मिलने आ जाएंगे ।।


(गुरु भक्ति की कहानियां

भक्त के वश मे है भगवान

भक्ति में शक्ति

भक्ति का अर्थ)

श्री वृन्दावन बांके बिहारी लाल की जय हो !!!

("अगर यह पोस्ट अच्छी लगे तो अपने दोस्तों और परिवार वालों के साथ शेयर ज़रूर करें।")

18 Jul 2017

इस दुनीया को हम जिस नजर से देखेंगे ये दुनीया हमे वैसी ही दिखेगी.

इस दुनीया को हम जिस नजर से देखेंगे ये दुनीया हमे वैसी ही दिखेगी.. 



एक बार एक संत अपने शिष्यों के साथ नदी में स्नान कर रहे थे | तभी एक राहगीर वंहा से गुजरा तो महात्मा को नदी में नहाते देख वो उनसे कुछ पूछने के लिए रुक गया | वो संत से पूछने लगा ” महात्मन एक बात बताईये कि यंहा रहने वाले लोग कैसे है क्योंकि मैं अभी अभी इस जगह पर आया हूँ और नया होने के कारण मुझे इस जगह को कोई विशेष जानकारी नहीं है |”

इस पर महात्मा ने उस व्यक्ति से कहा कि ” भाई में तुम्हारे सवाल का जवाब बाद में दूंगा पहले तुम मुझे ये बताओ कि तुम जिस जगह से आये वो वंहा के लोग कैसे है ?” इस पर उस आदमी ने कहा “उनके बारे में क्या कहूँ महाराज वंहा तो एक से एक कपटी और दुष्ट लोग रहते है इसलिए तो उन्हें छोड़कर यंहा बसेरा करने के लिए आया हूँ |” महात्मा ने जवाब दिया बंधू ” तुम्हे इस गाँव में भी वेसे ही लोग मिलेंगे कपटी दुष्ट और बुरे |” वह आदमी आगे बढ़ गया |

थोड़ी देर बाद एक और राहगीर उसी मार्ग से गुजरता है और महात्मा से प्रणाम करने के बाद कहता है ” महात्मा जी मैं इस गाँव में नया हूँ और परदेश से आया हूँ और इस ग्राम में बसने की इच्छा रखता हूँ लेकिन मुझे यंहा की कोई खास जानकारी नहीं है इसलिए आप मुझे बता सकते है ये जगह कैसे है और यंहा रहने वाले लोग कैसे है ?”

महात्मा ने इस पर फिर वही प्रश्न किया और उनसे कहा कि ” मैं तुम्हारे सवाल का जवाब तो दूंगा लेकिन बाद में पहले तुम मुझे ये बताओ कि तुम पीछे से जिस देश से भी आये हो वंहा रहने वाले लोग कैसे है ??”

उस व्यक्ति ने महात्मा से कहा ” गुरूजी जन्हा से मैं आया हूँ वंहा भी सभ्य सुलझे हुए और नेकदिल इन्सान रहते है मेरा वंहा से कंही और जाने का कोई मन नहीं था लेकिन व्यापार के सिलसिले में इस और आया हूँ और यंहा की आबोहवा भी मुझे भा गयी है इसलिए मेने आपसे ये सवाल पूछा था |” इस पर महात्मा ने उसे कहा बंधू ” तुम्हे यंहा भी नेकदिल और भले इन्सान मिलेंगे |” वह राहगीर भी उन्हें प्रणाम करके आगे बढ़ गया |

शिष्य ये सब देख रहे थे तो उन्होंने ने उस राहगीर के जाते ही पूछा गुरूजी ये क्या अपने दोनों राहगीरों को अलग अलग जवाब दिए हमे कुछ भी समझ नहीं आया | इस पर मुस्कुराकर महात्मा बोले वत्स आमतौर पर हम आपने आस पास की चीजों को जैसे देखते है वैसे वो होती नहीं है इसलिए हम अपने अनुसार अपनी दृष्टि (point of view) से चीजों को देखते है और ठीक उसी तरह जैसे हम है | अगर हम अच्छाई देखना चाहें तो हमे अच्छे लोग मिल जायेंगे और अगर हम बुराई देखना चाहें तो हमे बुरे लोग ही मिलेंगे | सब देखने के नजरिये (पर निर्भर करता है ।



यही जिन्दगी का सार है |


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अच्छी सोच शायरी

सोच क्या है

अछी आदत

सोच में परिवर्तन

सकारात्मक सोच पर कहानी

सोच पर कविता

अछी बातें

सकारात्मक सोच पर कविता

7 Jul 2017

हिंदी व्याकरण - छंद किसे कहते हैं, छंद से सम्बंधित पूरी जानकारी विस्तार से पढ़े

 छंद किसे कहते हैं?

निश्चित चरण, वर्ण, मात्रा, गति, यति, तुक और गण आदि के द्वारा नियोजित पद्य रचना को छंद कहते हैं।

छंद के कितने अंग होते हैं?
छंद के छह अंग होते हैं:-
1)-चरण या पाद
(क) समचरण
(ख) विषम चरण
2)- वर्ण और मात्रा
(क) लघु या ह्रस्व
(ख) गुरु या दीर्घ 
3)-यति
4)- गति
5)- तुक
6)-गण

चरण या पाद किसे कहते है?
चरण को पाद भी कहते हैं। एक छंद में प्राय: चार चरण होते हैं। चरण छंद का चौथा हिस्सा होता है। प्रत्येक पाद में वर्णों या मात्राओं की संख्या निश्चित होती है।

चरण कितने प्रकार के होते हैं?
चरण दो प्रकार के होते हैं:-
1)-समचरण:-दुसरे और चौथे चरण को समचरण कहते हैं।
2)-विषमचरण:- पहले और तीसरे चरण को विषमचरण कहते हैं।
319. वर्ण और मात्रा किसे कहते है?
छंद के चरणों को वर्णों या मात्राओं की
गणनानुसार व्यवस्थित किया जाता है। छंद में प्रयुक्त अक्षर को वर्ण कहते हैं।
मात्रा की दृष्टि से वर्ण कितने प्रकार के होते हैं?

मात्रा की दृष्टी से वर्ण दो प्रकार के होते है:-
1)- लघु या ह्रस्व
3)-गुरु या दीर्घ


हिंदी व्याकरण -  छंद किसे कहते हैं, छंद से सम्बंधित पूरी जानकारी विस्तार से पढ़े

 मात्रा की दृष्टि से वर्ण कितने प्रकार के होते हैं?
मात्रा की दृष्टी से वर्ण दो प्रकार के होते है:-
1)- लघु या ह्रस्व
3)-गुरु या दीर्घ

लघु या ह्रस्व वर्ण किसे कहते है?
जिनके बोलने में कम समय लगता है,लघु या ह्रस्व वर्ण कहलाते हैं।
यथा -अ,इ, उ,ऋ , चन्द्र बिंदु(  ँ) तथा इनके युक्त  व्यंजन  यथा-प,पि, पु, पृ,तथा पँ। इसका चिन्ह (l)  खड़ी लकीर है।


 गुरु या दीर्घ वर्ण किसे कहते हैं?

जिनके बोलने में कम समय लगता है,लघु या ह्रस्व वर्ण कहलाते हैं।
यथा -अ,इ, उ,ऋ , चन्द्र बिंदु(  ँ) तथा इनके युक्त  व्यंजन  यथा-प,पि, पु, पृ,तथा पँ। इसका चिन्ह (l)  खड़ी लकीर है।
जिनके बोलने में लघु वर्णों की अपेक्षा अधिक समय लगता है,वे गुरु या दीर्घ वर्ण कहलाते है।
यथा- आ,ई, ऊ, ए, ऐ, ओ,  औ, अनुस्वार(अं)  और विसर्ग(:) तथा इनके युक्त व्यंजन यथा- पा, पी, पू, पे, पै, पो, पौ,पं, प:। इनका चिन्ह (s)है।

छंद में मात्रा से क्या अर्थ है?

वर्ण के बोलने में जो समय लगता है, उसे हम मात्रा कहते हैं अर्थात किसी वर्ण के उच्चारण काल की अवधि को मात्रा कहते हैं।


यति किसे कहते हैं?
इसे विराम और विश्राम भी कहते हैं। छंद का पाठ करते समय कुछ देर के लिए जहाँ रुकना पड़ता है, उसे ही यति कहते हैं। इसके लिए कुछ चिन्ह निश्चित होते हैं।
जैसे:-
( , ), ( l ), ( l l ), ( ? ), ( ! ) आदि।

गति किसे कहते हैं?
किसी छंद को पढ़ते समय हम एक प्रवाह का अनुभव करते हैं, उसे गति या लय कहते हैं|

तुक किसे कहते है ?

छंद में पदांत के अक्षरों की समानता को तुक कहते हैं। इस दृष्टी से छंद के दो भेद हैं:-
1)- तुकान्त
2)- अतुकान्त

तुकान्त कविता किसे कहते हैं?

इसमें चरण के अंत में वर्णों की आवृत्ति होती है, तुकान्त कविता कहते है।
उदाहरण:-
" हमको बहुत है भाती हिंदी।
हमको बहुत है प्यारी हिंदी।".

अतुकांत कविता किसे कहते हैं?

चरण के अंत में वर्ण की आवृत्ति न हो उसे अतुकांत कविता कहते हैं। नई कविता प्रायः अतुकांत होती है।
उदाहरण:-
"काव्य सर्जक हूँ
प्रेरक तत्वों के अभाव में
लेखनी अटक गई हैं
काव्य-सृजन हेतु
तलाश रहा हूँ उपादान।"

गण किसे कहते हैं?

वर्णिक छंदों की गणना 'गण' के क्रमानुसार की जाती है। तीन वर्णों का एक गन होता है। गणों की संख्या आठ होती है।
जैसे:-
यगण, तगण, लगण, रगण, जगण, भगण,  नगण और सगण।
गुणसूत्र:-
" यमाताराजभानसलगा "
जिस गण को जानना हो  उस गण के पहले अक्षर को लेकर आगे के दो अक्षरों को मिलाकर वह गण बन जाता है।
जैसे:-
यमाता में  l S S लघु गुरु गुरु  यगण

छंद कितने प्रकार के होते हैं?

छंद चार प्रकार के होते हैं:-
1)- मात्रिक छंद
2)-वर्णिक छंद
3)-वर्णिक वृत्त
4)-मुक्त छंद

मात्रिक छंद किसे कहते हैं?

जिन छंदों की रचना मात्राओं की गणना के आधार पर होती है, उन्हें मात्रिक छंद कहते हैं। जैसे- दोहा, चौपाई, रोला आदि।
सममात्रिक छंद किसे कहते हैं?

जहाँ छंदों में सभी चरण समान होते हैं, उसे सममात्रिक छंद कहते हैं।
उदाहरण:-
"मुझे नहीं ज्ञात कि मैं कहाँ हूँ
प्रभो! यहाँ हूँ अथवा वहाँ हूँ।"
इसमें 11-11 मात्राएँ हैं।

अर्धमात्रिक छंद किसे कहते है?


जिसमे पहला और तीसरा चरण एक समान हो तथा दूसरा और चौथा चरण उनसे भिन्न हों किन्तु आपस में समान हों, उसे अर्धमात्रिक छंद कहते हैं। जैसे-दोहा छंद।

विषम मात्रिक छंद किसे कहते है?

जहाँ चरणों में दो चरण अधिक समान न हों , उसे विषम मात्रिक छंद कहते हैं। ऐसे छंद प्रचलन में  कम हैं। जैसे- छप्पय छंद।

वर्णिक छंद किसे कहते हैं?
जिन छंदों की रचना वर्णों की गणना के आधार पर होती है, उसे वार्णिक छंद कहते हैं। जैसे- दुर्मिल सवैया।
वृत्त किसे कहते हैं?
इसमें वर्णों की गणना होती है। इसमें चार समान चरण होते हैं और प्रत्येक चरण में आने वाले लघु-गुरु का क्रम सुनिश्चित होता है। जैसे- मत्तगयन्द सवैया।
मुक्त छंद किसे कहते हैं?
चरणों की अनियमित, असमान, स्वछंद गति और भाव के अनुकूल यति विधान ही मुक्त छंद की विशेषता है। इसे रबर या केंचुआ छंद भी कहते हैं।

दोहा छंद किसे कहते हैं?

यह अर्धसममात्रिक छंद है।यह सोरठा छंद के विपरीत होता है। इसमें प्रथम और तृतीय चरण में 13-13 तथा द्वितीय और चतुर्थ चरण में11-11 मात्राएँ होती है। चरण के अंत में लघु ( l ) होना आवश्यक है।
उदाहरण:-
   Sll   SS  Sl  S  SS  Sl   lSl
"कारज धीरे होत है, काहे होत अधीर।
  lll   Sl    llll   lS     Sll    SS  Sl
समय पाय तरुवर फरै, केतक सींचो नीर ।।"

सोरठा छंद किसे कहते है?

यह अर्धसममात्रिक छंद है। यह दोहा छंद के विपरीत होता है। इसमें प्रथम और तृतीय चरण में 11-11 तथा द्वितीय और चतुर्थ चरण में 13-13 मात्राएँ होती हैं।
उदाहरण:-
  lS   l  SS  Sl    SS   ll   lSl   Sl
"कहै जु पावै कौन , विद्या धन उद्दम बिना।
S   SS  S Sl    lS   lSS   S  lS
ज्यों पंखे की पौन, बिना डुलाए ना मिलें।"

रोला छन्द  किसे कहते हैं?


यह एक मात्रिक छंद है। इसमें चार चरण होते हैं। इसके प्रत्येक चरण में 11 और 13 के क्रम से 24 मात्राएँ होती हैं।
उदाहरण:-
    SSll      llSl    lll     ll  ll   Sll   S
"नीलाम्बर परिधान, हरित पट पर सुन्दर है।
सूर्य चन्द्र युग-मुकुट मेखला रत्नाकर है।
नदियाँ प्रेम-प्रवाह, फूल तारे मंडन है।
बंदी जन खग-वृन्द, शेष फन सिंहासन है।"

गीतिका छंद किसे कहते हैं?

यह एक मात्रिक छंद है। इसके चार चरण होते है। प्रत्येक चरण में 14  और 12 यति से 26 मात्राएँ होती है। अंत में क्रमश: लघु-गुरु होता है।
उदाहरण:-
S SS    SlSS    Sl    llS   SlS
"हे प्रभो आनंददाता ज्ञान हमको दीजिये।
शीघ्र सारे दुर्गुणों को दूर हमसे कीजिये।
लीजिए हमको शरण में, हम सदाचारी बने।
ब्रह्मचारी, धर्मरक्षक वीर व्रतधारी बनें।"

हरिगीतिका छंद किसे कहते हैं?

यह एक मात्रिक छंद है। इसमें चार चरण होते हैं। इस छंद के प्रत्येक चरण में16 और 12 के विराम से कुल 28 मात्राएँ होती हैं।
उदाहरण:-
SS ll    Sll   S  S S  lll    SlS    llS
"मेरे इस जीवन की है तू, सरस साधना कविता।
मेरे तरु की तू कुसुमित , प्रिय कल्पना लतिका।
मधुमय मेरे जीवन की प्रिय,है तू कल कामिनी।
मेरे कुंज कुटीर द्वार की, कोमल चरण-गामिनी।"

उल्लाला छंद किसे कहते हैं?

यह एक मात्रिक छंद है। इसके प्रत्येक चरण में15 और 13 की यति से कुल 28 मात्राएँ होती हैं।
उदाहरण:-
   llS   llSl      lSl  S    llSS    ll   Sl   S
"करते अभिषेक पयोद हैं, बलिहारी इस वेश की।
हे मातृभूमि! तू सत्य ही, सगुण-मूर्ति  सर्वेश की।"

चौपाई छंद किसे कहते हैं?

यह एक मात्रिक छंद है। इसमें चार चरण होते हैं। प्रत्येक चरण में16 मात्राएँ होती है। चरण के अंत में गुरु (S )  और  लघु(l ) नही होना चाहिए, पर्दों लघु ( ll ) या दो गुरु (SS) हो सकते हैं।
उदाहरण:-
  ll     ll     Sl   lll      llSS  
"इहि विधि राम सबहिं समुझावा
गुरु पद पदुम हरषि सिर नावा।"
हिंदी व्याकरण

बरवै (विषम) छंद किसे कहते हैं?



इसमें प्रथम और तृतीय चरणों में 12 तथा द्वितीय और चतुर्थ चरण में 7(सम) मात्राएँ होती हैं।
उदाहरण:-
"चम्पक हरवा अंग मिलि अधिक सुहाय।
जानि परै सिय हियरे, जब कुम्हिलाय।।"

छप्पय छंद किसे कहते हैं?

इस छंद में 6 चरण होते हैं। प्रथम चार चरण रोला छंद के होते हैं तथा अंतिम 2 उल्लाला के होते हैं।
उदाहरण:-
"नीलाम्बर परिधान हरित पट पर सुन्दर है।
सूर्य-चन्द्र युग मुकुट, मेखला रत्नाकर है।
नदिया प्रेम-प्रवाह, फूल -तो मंडन है।
बंदी जन खग-वृन्द, शेषफन  सिंहासन है।
करते अभिषेक पयोद है, बलिहारी इस वेश की।
हे मातृभूमि! तू सत्य ही,सगुण मूर्ति सर्वेश की।।"

 कुंडलियाँ छंद किसे कहते हैं?
इसके 6 चरण होते हैं। आरम्भ के दो चरण दोहा तथा बाद के चार चरण उल्लाला के होते हैं। इस प्रकार प्रत्येक चरण में 24 मात्राएँ होती हैं।(13+11) दोहे का प्रथम चरण रोला के आरम्भ में रखा जाता है। दोहे का सर्वप्रथम रोला के अंतिम चरण के अंत में रखा जाता है। इस प्रकार इसके प्रत्येक चरण में 24 मात्राएँ होती हैं।
उदाहरण:-
"घर का जोगी जोगना, आन गाँव का सिद्ध।
बाहर का बक हंस है, हंस घरेलू गिद्ध
हंस घरेलू गिद्ध ,  उसे पूछे ना कोई।
जो बाहर का होई, समादर ब्याता सोई।
चित्तवृति यह दूर, कभी न किसी की होगी।
बाहर ही धक्के खायेगा , घर का जोगी।।"


सवैया छंद किसे कहते हैं?

इसके प्रत्येक चरण में 22 से 26 वर्ण होते हैं। सवैया की कोटि में एक से अधिक छंद होते हैं।
1)- मदिरा सवैया (22 वर्ण, 7 भगण तथा अंत में          एक गुरु)  होते हैं।
2)- मालती या मत्त गयंद (23 वर्ण , 7 भगण  तथा        दो गुरु) होते हैं।
3)- दुर्मिल सवैया या चन्द्रकला (सुन्दरी) (24 वर्ण         तथा 8 सगण) होते हैं।
उदाहरण:-
"लोरी सरासन संकट कौ,
सुभ सीय स्वयंवर मोहि बरौ।
नेक ताते बढयो अभिमानंमहा,
मन फेरियो नेक न स्न्ककरी।
सो अपराध परयो हमसों,
अब क्यों सुधरें तुम हु धौ कहौ।
बाहुन देहि कुठारहि केशव,
आपने धाम कौ पंथ गहौ।।"

मन हर, मनहरण, घनाक्षरी या कवित्त किसे कहते हैं?

यह वार्णिक सम छंद है। इसके प्रत्येक चरण में 31 वर्ण होते हैं तथा अंत में तीन लघु  (l l l) होते हैं। 16, 17 वें वर्ण पर विराम (यति) होता है।
उदाहरण:-
"मेरे मन भावन के भावन के ऊधव के आवन की
सुधि ब्रज गाँवन में पावन जबै लगीं।
कहै रत्नाकर सु ग्वालिन की झौर-झौर
दौरि-दौरि नन्द पौरि,आवन सबै लगीं।
उझकि-उझकि पद-कंजनी के पंजनी पै,
पेखि-पेखि पाती,छाती छोहन सबै लगीं।
हमको लिख्यौ है कहा,हमको लिख्यौ है कहा,
हमको लिख्यौ है कहा,पूछ्न सबै लगी।।"

द्रुत विलम्बित छंद किसे कहते है?

प्रत्येक चरण में 12 वर्ण, एक नगण, दो भगण तथा एक सगण होते है।
उदाहरण:-
"दिवस  का अवसान समीप था,
गगन था कुछ लोहित हो चला।
तरु शिखा पर थी अब राजती,
कमलिनी कुल-वल्लभ की प्रभा।।"

 मालिनी छंद किसे कहते है?

इस वार्णिक सम वृत्त छंद मे 15 वर्ण,दो तगण,एक मगण तथा दो यगण होते हैं। आठ  एवं सात वर्ण एवं विराम होता है।
उदाहरण:-
"प्रभुदित मथुरा के मानवों को बना के,
सकुशल रह के औ विध्न बाधा बचाके।
निज प्रिय सूत दोनों , साथ ले के सुखी हो,
जिस दिन पलटेंगे, गेह स्वामी हमारे।।"

मंदाक्रांता छंद किसे कहते हैं?

इसमें प्रत्येक चरण में 17 वर्ण होते हैं, एक भगण, एक नगण, दो तगण तथा दो गुरु होते है।5,  6 तथा 7वें वर्ण पर यति(विराम) होता है।ं
उदाहरण:-
"कोई क्लांता पथिक ललना चेतना शून्य होक़े,
तेरे जैसे पवन में , सर्वथा शान्ति पावे।
तो तू हो के सदय मन, जा उसे शान्ति देना,
ले के गोदी सलिल उसका, प्रेम से तू सुखाना।।"

 इन्द्र्व्रजा छंद किसे कहते हैं?

प्रत्येक चरण में11 वर्ण, 2 जगण तथा अंत में 2 गुरु होते हैं।
उदाहरण:-
"माता यशोदा हरि को जगावै।
प्यारे उठो मोहन नैन खोलो।
द्वारे खड़े गोप बुला रहे हैं।
गोविन्द, दामोदर माधवेति।।"


उपेन्द्रव्रजा छंद किसे कहते हैं?

इसमें प्रत्येक चरण में 11वर्ण , 1 नगण, 1 तगण, 1जगण और अंत में 2  गुरु  होते हैं।
उदाहरण:-
"पखारते हैं पद पद्म कोई,
चढ़ा रहे हैं  फल -पुष्प कोई।
करा रहे हैं पय-पान कोई
उतारते श्रीधर आरती हैं।।"

अरिल्ल छंद किसे कहते हैं?


प्रत्येक चरण में 16 मात्राएँ होती है, चरण के अंत में लघु अथवा यगण (lSS) होना चाहिए।
उदाहरण:-
"मन में विचार इस विधि आया।
कैसी है यह प्रभुवर माया।
क्यों आगे खड़ी है विषम बाधा।
मैं जपता रहा, कृष्ण-राधा।।

 लावनी छंद किसे कहते हैं?

प्रत्येक चरण या दल में 22 मात्राएँ तथा चरण के अंत में गुरु ( S )  होते हैं।
उदाहरण:-
"धरती के उर पर जली अनेक होली।
पर रंगों से भी जग ने फिर नहलाया।
मेरे अंतर की रही धधकती ज्वाला।
मेरे आँसू ने ही मुझको बहलाया।।"

राधिका छंद किसे कहते हैं?
प्रत्येक चरण में 22 मात्राएँ होती हैं।13 और 9 पर यति (विराम)  होता है।
उदाहरण:-
"बैठी है वसन मलीन पहिन एक बाला।
बुरहन पत्रों के बीच कमल की माला।
उस मलिन वसन म, अंग-प्रभा दमकीली।
ज्यों धूसर नभ में चंद्रप्रभा चमकीली।।"
दिग्पाल छंद किसे कहते हैं?
इस छंद के प्रत्येक चरण में 12-12 के विराम से 24 मात्रा होती है।
उदाहरण:-
"हिमाद्रि तुंग-श्रृंग से प्रबुद्ध शुद्ध भारती।
स्वयं प्रभा समुज्ज्वला स्वतंत्रता पुकारती।
अमर्त्य वीर पुत्र तुम, दृढ प्रतिज्ञ सो चलो।
प्रशस्त पुण्य-पंथ है, बढ़े चलो-बढ़े चलो।।"
त्रोटक छंद किसे कहते हैं?
इसके प्रत्येक चरण में12 मात्रा तथा 4  सगण होते हैं।
उदाहरण:-
"शशि से सखियाँ विनती करती,
टुक मंगल हो विनती करतीं।
हरि के पद-पंकज देखन दै
पदि मोटक माहिं निहारन दै।।"

भुजंगी छंद किसे कहते है?
प्रत्येक चरण में11 वर्ण तथा तीन सगण, एक लघु तथा एक गुरु होते हैं।
उदाहरण:-
"ना माधुर्य का तेरा भी पार है,
महा मोद भागीरथी सी भरी।
करो स्नान आओ शान्ति से,
मिले मुक्ति ऐसी न पाते यती।।"
 वियोगिनी छंद किसे कहते हैं?
इसके सम(दुसरे और चौथे) चरणों में 11-11 तथा विषम(पहले और तीसरे) चरणों में10 वर्ण होते हैं। विषम चरणो में दो सगण, एक जगण और एक सगण तथा लघु और एक गुरु होते हैं।
उदाहरण:-
"विधि ना कृपया प्रबोधिता,
सहसा मानिनि  सुख से सदा
करती रहती सदैव ही
करुण की  मद-मय साधना।।"
 वंशस्थ छंद किसे कहते हैं?
इसके प्रत्येक चरण में 12 वर्ण, एक नगण, एक तगण, एक जगण तथा एक रगण होते हैं।
उदाहरण:-
"गिरिन्द्र में व्याप्त विलोकनीय थी,
वनस्थली मध्य प्रशंसनीय थी
अपूर्व शोभा अवलोकनीय थी
असेत जम्बालिनी कूल जम्बुकीय।।"

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